बोद्या चुटाइ होलि                                       : शिवराज कलौनी

 

सुका हाङ्ङा खुट्टो जन राखै चमेलि , रुख छुटाइ होलि
नसुक्याइका रणैल का हाङ्ङा टुटाइ होलि

आँखा बुजै जन झिक्कै , सैना मणि लै कठा हिटाइ होलि
कान गुद्गुदी रे पेट कालकुती पछा कच्छा छुटाइ होलि

दुनिया मतलबी छ ,ढोका बन्द गरि बिल्लो चुटाइ होलि
भट्ट चड्या जसो नाइ रे पप कर्न भुटाइ होलि

हस्किनको गतानी फाँणो , घौल लोटाइ होलि
हावाले रुख हल्किन्नारएको ,चिण्णो छुटाइ होलि

सुन्दर ऐना जुकतले राखेइ ,सिसो टुटाइ होलि
जत्ते जसो उत्ते उसि होइरएइ, नति हेल्वा घोटाइ होलि

भुलाइबरे उफ्फाड हल्ल्या छन सङ्ग,पाछा देसि लुटाइ होलि
और त पाइक हुन रे, तेरि बोद्या कुटाइ होलि

तबै चमेली बचि४बरे रएइ , नत बोद्या कुटाइ होलि
नत बोद्या कुटाइ होलि